यूपी पंचायत चुनाव : दलित समुदाय को मिली बड़ी संजीवनी दशकों से कायम सियासी वर्चस्व टूटा

उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के आरक्षण की सूची जारी हो गई है, जिसने सूबे के दिग्गज नेताओं के सारे समीकरण को ध्वस्त करके रख दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि पूर्व मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की ग्राम पंचायत पहली बार आरक्षण के दायरे में आई है, जिसके चलते दशकों से कायम उनके सियासी वर्चस्व का टूटना तय माना जा रहा है. इसमें सबसे बड़ा झटका सपा को अपने मजबूत गढ़ इटावा में लगा है, जहां मुलायम सिंह यादव के गांव सैफाई का प्रधान और ब्लॉक प्रमुख  पहली बार दलित समुदाय से चुनकर आएगा.

पंचायत चुनाव में आरक्षण की लिस्ट जारी होने के बाद जनपद इटावा के लगभग एक दर्जन राजनेताओं की ग्राम पंचायतों की सीटें पहली बार परिवर्तित हुई है. ढाई दशक यानी 1995 के बाद इटावा के ब्लॉक सैफई, ब्लॉक बढ़पुरा, ब्लॉक ताखा, ब्लॉक भर्थना, ब्लॉक बसरेहर, ब्लॉक जसवंतनगर और ब्लॉक महेवा की ग्राम पंचायतों में पहली बार अनुसूचित जाति के प्रधान चुने जाएंगे.

दरअसल, यूपी में पंचायती राज अधिनियम के अंतर्गत 1995 के पंचायत चुनाव में आरक्षण लागू हुआ था, जिसके तहत  33 प्रतिशत सीट सभी कटैगरी में महिलाओं के लिए, 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग, और 21 प्रतिशत अनुसूचित जाति और एक फीसदी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था.

सूबे में पंचायत के प्रत्येक चुनाव में यह आरक्षण लागू हुआ. लेकिन जनपद इटावा में आठ ब्लॉकों में आरक्षण लागू नहीं हुआ. इसी के चलते सूबे में आरक्षण होने के बाद भी अनुसूचित जाति को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका. कई नेताओं की ग्रामसभा अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित नही हुई थी,  जो कि अब पहली बार आरक्षित हुई हैं. इसी के चलते इन सीटों पर सालों से काबिज नेताओं को सियासी तौर पर गहरा झटका लगा है.

वहीं, जालौन में आरक्षण की लिस्टआते ही कहीं गम तो कहीं खुशी का मौहाल है. खासतौर से ऐसे लोगों को दुख जरूर हुआ है, जिनकी लिए प्रधानी उनके परिवार की विरासत बन गई थी. दो दशक से जौलान के डकोर ग्राम सीट पर एक की परिवार का कब्जा था. इस बार यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई है, जिसके चलते राघवेंद्र परिवार का सियासी वर्चस्व टूटना तय माना जा रहा है. पहले लक्ष्मी देवी प्रधान बनीं, उसके बाद उनके बेटे राघवेंद्र चुने गए. इतना ही नहीं इसके बाद लक्ष्मी देवी की बहु आशा देवी और 2015 में छोटी बहु सरोजदेवी ने चुनाव जीता था. लेकिन इस बार उनके हाथ से कुर्सी निकल गई है.

ऐसे ही महराजगंज जिले की जोगिया ग्राम पंचायत पर डेढ़ दशक से काबिज दो परिवार को सियासी वर्चस्व इस बार टूट गया है, क्योंकि इस बार यह सीट आरक्षण के दायरे में आ गई है. जोगिया गांव सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी माने जाने वाले वीरेन्द्र सिंह व उनके प्रतिद्धंदी पूर्व ब्लाक प्रमुख मोहन सिंह का दबदबा है. इसके अलावा किसी तीसरे को मौका नहीं मिल पाया था, लेकिन इस बार अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व कर दी गई है.

योगी आदित्यनाथ जब गोरखपुर के सांसद हुआ करते थे तब वीरेन्द्र सिंह उनके प्रतिनिधि थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ का जिले का पहला दौरा घुघली क्षेत्र में ही हुआ था. वह वीरेन्द्र सिंह के घर भी पहुंचे थे और उनके विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिए थे. घुघली टाउन एरिया का चेयरमैन रह चुके वीरेन्द्र सिंह का जिले की सियासत में खास मुकाम है, पर इसी गांव में उनके प्रतिद्वंदी पूर्व ब्लाक प्रमुख मोहन सिंह ने वीरेन्द्र सिंह को भी चुनावी वॉक ओवर नहीं दिया और चुनौती देते रहते थे. इससे गांव के प्रधानी का परिणाम भी बदलता रहता था, लेकिन इन्हीं दोनों परिवार के पास यह सीट बनी रही. अब आरक्षण ने दोनों ही परिवारों के बीच का सियासी विवाद को शांत कर दिया है और अब यह सीट पर काफी समय के बाद कोई दलित समुदाय का प्रधान चुना जाएगा.

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